इतना चिल्लाते क्यों हो फोन पर?

अक्सर हम अपने आस-पास लोगों को फ़ोन पर ज़ोर-ज़ोर से बात करते देखते-सुनते हैं. कई बार तो कुछ लोग इतनी तेज़ी से बोलते हैं कि आप काम करते करते चौंक उठते हैं कि भई, ये क्या हुआ? क्यों इतना शोर मचा रहे हैं फ़ोन पर? आप उस इंसान से पूछ भी बैठते हैं कई बार कि घर में सब ठीक तो है ना? मगर, क्या आपने कभी सोचा है कि आख़िर लोग फ़ोन पर बात करते वक़्त इतना चीख़ते क्यों हैं? क्यों वो बोलचाल का सलीक़ा भूल जाते हैं?

अभी हाल में ही बीबीसी 4 रेडियो सीरीज़ पर, डॉक्टर एडम रदरफ़ोर्ड और डॉक्टर हना फ्राय, एक टॉक शो कर रहे थे. इसमें एक सवाल, लोगों के फ़ोन पर ज़ोर ज़ोर से बात करने को लेकर भी था. सीरीज़ के अमरीकी श्रोता डेनियल सरानो ने पूछा कि आख़िर लोग इतना चिल्लाकर क्यों बात करते हैं? पहले के लोग तो इसका और बुरा मानते होंगे? वैसे बहुत से लोग हैं जो फ़ोन पर चीख़-चीख़कर बात करते हैं. मगर क्या इसका कोई वैज्ञानिक पहलू भी है?

इस सवाल के जवाब की शुरुआत होती है फ़ोन के डिज़ाइन पर एक नज़र डालने से. असल में शुरू में जो टेलीफ़ोन आए थे, उसमें बोलने वाला ख़ुद अपनी आवाज़ भी सुन सकता था. इसे साइडटोन के ज़रिए सुना जा सकता था.

इसका फ़ायदा ये था कि बात करने वाले को साफ़ मालूम होता था कि उसकी कितनी आवाज़ फ़ोन के दूसरे छोर पर मौजूद इंसान तक पहुंच रही है. इससे किसी को चिल्लाकर बात करने की ज़रूरत ही नहीं थी. अब लैंडलाइन फ़ोन घट रहे हैं. मोबाइल का ज़माना है. तो सवाल ये है कि क्या मोबाइल से साइडटोन की सुविधा हटा दी गई है, इस वजह से लोग चीख़कर बात करने लगे हैं?

क्योंकि उन्हें पता ही नहीं चलता कि सामने वाला उनकी कितनी आवाज़ सुन रहा है. मगर जानकार इस बात को ख़ारिज करते हैं. फ़ोन के स्पेशलिस्ट निक ज़कारोव कहते हैं कि मोबाइल में साइडटोन के अंतरराष्ट्रीय पैमाने तय हैं. आज सारे मोबाइल उन्हीं के हिसाब से बनते हैं.  पर दिक़्क़त ये है कि मोबाइल फ़ोन मोबाइल हैं, मतलब इन्हें लेकर चलते-फिरते बात की जा सकती है. कई बार आस-पास इतना शोर होता है कि इंसान को अपनी बात कहने के लिए चीख़कर बोलना पड़ता है.shouting over phone

असल में ये इंसान की आदत होती है कि वो आस-पास हो रहे शोर के हिसाब से अपनी आवाज़ ऊंची करता जाता है. उसे एहसास ही नहीं होता कि ज़ोर से बोलते-बोलते कब वो चीख़ने लगता है. इसीलिए हम अक्सर लोगों को मोबाइल पर चीख़-चीख़कर बात करते देखते हैं. ऐसे लोगों को पक्का बेसलीक़ा कहा जाता है.

मगर ऐसा पहली बार नहीं है कि फ़ोन की वजह से तहज़ीब का सवाल उठा हो. जब पहले पहल फ़ोन बने तो उस वक़्त इंग्लैंड में महारानी विक्टोरिया का राज था. वो दौर अपनी ख़ास तहज़ीब, पहनावे और चाल-चलन के लिए मशहूर हुआ.

उस वक़्त लोगों ने फ़ोन को लेकर तरह-तरह के सवाल उठाए. मसलन, क्या बिना कपड़ों के फ़ोन पर बात करना ठीक रहेगा? क्या महिलाओं से फ़ोन पर बातचीत करते वक़्त खड़े रहना चाहिए, वग़ैरह? वक़्त ने उन सवालों को ख़ुद-ब-ख़ुद हल कर दिया.

शायद वैसे ही हम, मोबाइल पर लोगों के चीख़कर बात करने के आदी हो जाएं. फिर फ़ोन के इस्तेमाल के सलीक़े का कोई नया सवाल खड़ा हो सकता है.